सब कुछ खोया, कुछ ना पाया,ये कैसी जिद है पाने की;
उड़ने की चाहत में ऊँचा, बार बार गिर जाने की;
मंजिल धुंधली,राहें धुंधली;पर ज्योत ह्रदय में आशा की,
कर पाउँगा मैं आखिर हासिल ,जो बचपन से अभिलाषा की;
दिल जलता है, धुआं उठता है; ये आग धधकती है कैसी,
दिल बच्चा है, कोमल है ; दुनिया निष्ठुर औ वहशी;
पर कुछ तो है कहीं पे, जो मुझे खींच वहीँ पे लाता है,
सोने चांदी नहीं वहां पे ,पर दिल को सुकून आ जाता है;
सब कुछ खोया, कुछ ना पाया,ये कैसी जिद है पाने की;
उड़ने की चाहत में ऊँचा, बार बार गिर जाने की;
मंजिल धुंधली,राहें धुंधली;पर ज्योत ह्रदय में आशा की,
कर पाउँगा मैं आखिर हासिल ,जो बचपन से अभिलाषा की.
Friday, December 24, 2010
Thursday, December 9, 2010
पता नहीं क्यूँ और क्या...
मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं यूँ उन्मुक्तता के साथ कभी कुछ लिखने का प्रयास भी करूँगा परन्तु कुछ बातें अनायास हो जाती हैं, जब खुद पे जोर नहीं चलतातब ये मानना पड़ता है कि ईश्वरका जोर चल रहा है और जब ईश्वर का जोर चलता है तब इंसान की सारी भावनाएं यूँ जुड़ते चली जाती हैं शब्दों के माध्यम से कि कभी कभी शब्द शब्द ना लगके एक आइना लगने लगता है, हमारे हृदय के उन समस्त भावों को जो हम कभी अभिव्यक्त नहीं कर पाते , किन्तु दिल हिलोरे मार मार के उन शब्दों को हृदय के सागर मंथन के विष या अमृत के भेस में बाहर भेजने को उद्द्यत हो जाता है...ह्रदय कि संवेदनाओं के भी दो प्रकार होते हैं - एक तो वो होता है जो आप किसी को नहीं पाते , शायद खुद से भी नहीं कहना चाहते और एक वो जो बिना कहे रह नहीं पाते..सच ईश्वर ने हृदय नाम के इस मांसल टुकड़े को किसी धातु से बनाया होता तो शायद यह दुनिया कुछ और होती...ओपन ब्लोगिंग मुझे पसंद नहीं और मेरी धृष्टता तो देखिये मैं उसी माध्यम का प्रयोग करते हुए उसकी बुराई किये जा रहा हूँ...पर फिर भी जहाँ तक मेरी बात है, मैं इस मंच पर बिरले ही नजर आऊंगा..और आऊंगा भी तो बड़े ही गुमनाम तरीके से क्यूंकि मैं ना अमिताभ बच्चन नहीं हूँ कि मेरी बातें ब्लॉग पे पढ़ी जाएँ और उसपे मंथन हो..ये मेरा मंथन है , और मेर उदगार है...बस लिख रहा हूँ क्यूंकि लिखना है..और संतुलित तरीके से लिखने कि अनुमति मुझे भारतीय संविधान भी देता है और ईश्वर का कानून भी...
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